CAS को लेकर विश्वविद्यालय शिक्षकों का आंदोलन उग्र, शैक्षणिक गतिविधियां ठप CAS नहीं तो आंदोलन जारी रहेगा, शिक्षकों की सरकार को चेतावनी

शिमला प्रदेश के विश्वविद्यालयों में लंबित पड़ी कैरियर एडवांसमेंट स्कीम (CAS) को लागू करने की मांग को लेकर मंगलवार को संयुक्त कार्य समिति (JAC) के आह्वान पर हिमाचल प्रदेश के पांचों राज्य विश्वविद्यालयों के शिक्षकों ने सामूहिक रूप से शैक्षणिक कार्यों का पूर्ण बहिष्कार किया। इस दौरान हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला सहित प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों में नियमित कक्षाएं और अन्य शैक्षणिक गतिविधियां पूरी तरह प्रभावित रहीं।
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के सभी 48 विभागों में शिक्षकों ने आंदोलन का समर्थन करते हुए कार्य बहिष्कार किया। विश्वविद्यालय परिसर में दिनभर शैक्षणिक गतिविधियां ठप रहीं और बड़ी संख्या में शिक्षकों ने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए नारेबाजी की। संयुक्त कार्य समिति के नेताओं ने कहा कि यह आंदोलन केवल CAS लागू करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शिक्षकों के सम्मान, अधिकारों और प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था को बचाने की लड़ाई है।
शिक्षकों ने आरोप लगाया कि प्रदेश सरकार लंबे समय से विश्वविद्यालय शिक्षकों की जायज मांगों की लगातार अनदेखी कर रही है। CAS लागू न होने से प्रदेश के करीब तीन हजार विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय शिक्षक प्रभावित हो रहे हैं। उनका कहना है कि वर्षों तक सेवाएं देने के बावजूद उन्हें उनके वैधानिक अधिकारों और पदोन्नति लाभों से वंचित रखा जा रहा है।
आंदोलन को संबोधित करते हुए डॉ. जोगिंदर सकलानी ने कहा कि प्रदेश सरकार का रवैया पूरी तरह पक्षपातपूर्ण है और सरकार उच्च शिक्षा के प्रति गंभीर नजर नहीं आ रही। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय शिक्षक शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ होते हैं, लेकिन सरकार लगातार उनकी समस्याओं को नजरअंदाज कर रही है। उन्होंने कहा कि शिक्षकों को उनके वैधानिक अधिकारों से वंचित रखना न केवल अन्यायपूर्ण है बल्कि इससे उच्च शिक्षा व्यवस्था भी प्रभावित हो रही है।
डॉ. राजेश ने  कहा कि शिक्षकों के हितों की अनदेखी कर सरकार स्वयं अपना नुकसान कर रही है। उन्होंने कहा कि शिक्षक समाज का जागरूक वर्ग है और यदि उनकी समस्याओं को लगातार नजरअंदाज किया गया तो इसका राजनीतिक असर भी भविष्य में देखने को मिल सकता है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि भविष्य में सत्ता में वापसी के लिए शिक्षकों की नाराजगी सरकार को भारी पड़ सकती है।
वहीं डॉ. सुनील ने CAS लागू न करने को शिक्षकों का मानसिक उत्पीड़न करार दिया। उन्होंने कहा कि वर्षों से शिक्षक अपनी पदोन्नति और सेवा लाभों की प्रतीक्षा कर रहे हैं, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर अनावश्यक देरी के कारण उन्हें निराशा का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने प्रदेश के प्रशासनिक अधिकारियों को इस स्थिति के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि यदि समय रहते उचित निर्णय लिए जाते तो आज शिक्षकों को आंदोलन के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता।
संयुक्त कार्य समिति के प्रतिनिधि एवं हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिक्षक कल्याण संघ के अध्यक्ष डॉ. नितिन व्यास ने मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री से इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री स्वयं हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं और छात्र जीवन में कई आंदोलनों का नेतृत्व भी कर चुके हैं, इसलिए उन्हें शिक्षकों की पीड़ा और संघर्ष को समझना चाहिए।
डॉ. नितिन व्यास ने कहा कि शिक्षक सरकार से टकराव नहीं चाहते, बल्कि केवल अपने वैधानिक अधिकारों की बहाली चाहते हैं। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि सरकार ने शीघ्र सकारात्मक निर्णय नहीं लिया तो आंदोलन को और अधिक व्यापक तथा तेज किया जाएगा। उन्होंने कहा कि कहीं ऐसा न हो कि शिक्षकों की नाराजगी भविष्य में सरकार के लिए गंभीर राजनीतिक चुनौती बन जाए।
डॉ. अंकुश ने भी आंदोलन को संबोधित करते हुए कहा कि CAS केवल पदोन्नति का विषय नहीं बल्कि शिक्षकों के सम्मान, भविष्य और मनोबल से जुड़ा मुद्दा है। उन्होंने सरकार से शिक्षकों की भावनाओं को समझते हुए इस विषय में शीघ्र निर्णय लेने की अपील की।
संयुक्त कार्य समिति ने स्पष्ट किया कि जब तक प्रदेश सरकार विश्वविद्यालय शिक्षकों के लिए CAS लागू नहीं करती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। शिक्षकों ने कहा कि विश्वविद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तभी संभव है जब शिक्षकों का मनोबल ऊंचा हो और उन्हें समय पर उनके अधिकार प्राप्त हों

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