शिमला विश्वविद्यालय: जब ‘ज्ञान के मंदिर’ में गूँजी कृष्ण कन्हैया की बांसुरी, शिक्षा और संस्कार का हुआ अद्भुत संगम

 

जिस शिक्षा से सेवा, समर्पण और भक्ति का भाव न जागे, वह शिक्षा अधूरी है”— स्वामी निवासाचार्य

शिमला:राजधानी स्थित शिमला विश्वविद्यालय (एपीजी) के मंदिर परिसर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ के चतुर्थ दिवस पर कृष्ण जन्मोत्सव बड़े हर्षोल्लास और भक्तिमय वातावरण के बीच मनाया गया। मंदिर परिसर भक्ति, आध्यात्मिक ऊर्जा और सकारात्मकता से सराबोर दिखाई दिया, जहाँ विद्यार्थियों, शिक्षकों, श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों ने बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ सहभागिता की। कथा के दौरान पूरा वातावरण भगवान श्रीकृष्ण के जयकारों, भजनों और आध्यात्मिक ऊर्जा से गूंज उठा।

मुख्य कथावाचक स्वामी निवासाचार्य जी ने अपने प्रवचनों में शिक्षा, संस्कार, अध्यात्म और मानवता के गहरे संबंध को सरल एवं प्रभावशाली शब्दों में समझाया। उन्होंने कहा कि आज के आधुनिक और प्रतिस्पर्धात्मक युग में केवल डिग्री प्राप्त करना ही शिक्षा का उद्देश्य नहीं होना चाहिए, बल्कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो व्यक्ति के भीतर सेवा, समर्पण, भक्ति और मानवता के संस्कार जागृत करे। उन्होंने कहा कि “जिस विद्या से सेवा, समर्पण और भक्ति का भाव न आए, वह शिक्षा अधूरी है। सच्ची शिक्षा वही है जो व्यक्ति को स्वयं से ऊपर उठकर समाज, राष्ट्र और मानवता के लिए समर्पित होना सिखाए।”

स्वामी जी ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि वर्तमान समय में युवा मानसिक तनाव, अकेलेपन और दिशाहीनता जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। ऐसे समय में अध्यात्म और सत्संग युवाओं के लिए मानसिक शक्ति, सकारात्मक सोच और जीवन जीने की सही दिशा प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार एक शिक्षण संस्थान विद्यार्थियों का करियर बनाता है, उसी प्रकार सत्संग और संस्कार व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करते हैं। एक चरित्रवान और संस्कारवान युवा ही परिवार, समाज और राष्ट्र की वास्तविक उन्नति कर सकता है।

उन्होंने कथा के दौरान ‘पाप और आत्मबोध’ पर भी गहन संदेश दिया। स्वामी निवासाचार्य जी ने कहा कि जब मनुष्य अपने कर्मों और गलतियों का सच्चे मन से आत्मबोध कर लेता है, तब पाप स्वयं समाप्त हो जाते हैं। उन्होंने समझाया कि आत्मचिंतन और आत्मबोध व्यक्ति को भीतर से बदल देते हैं तथा उसे सकारात्मकता, भक्ति और सत्य के मार्ग की ओर ले जाते हैं।

स्वामी जी ने भक्त प्रह्लाद के चरित्र का उदाहरण देते हुए विद्यार्थियों को जीवन का महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार प्रह्लाद ने विपरीत परिस्थितियों और कठिन वातावरण में भी भगवान विष्णु की भक्ति और सत्य का मार्ग नहीं छोड़ा, उसी प्रकार विद्यार्थियों को भी जीवन की चुनौतियों से डरना नहीं चाहिए। यदि लक्ष्य स्पष्ट हो, विश्वास अटूट हो और इरादे नेक हों, तो सफलता अवश्य प्राप्त होती है।

उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल पुस्तकों का ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाला संस्कार है। जिस शिक्षा से मानवता, सेवा और करुणा का भाव जागृत हो, वही वास्तविक शिक्षा है। आज के युवाओं को प्रह्लाद की तरह निडर, अनुशासित और संस्कारवान बनने की आवश्यकता है, ताकि वे समाज की बुराइयों और नकारात्मकता का डटकर सामना कर सकें।

कथा के दौरान भजन-कीर्तन, कृष्ण जन्मोत्सव और आध्यात्मिक प्रवचनों ने सभी श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। बड़ी संख्या में विद्यार्थियों, शिक्षकों, ग्रामीणों और श्रद्धालुओं ने कथा में भाग लेकर आध्यात्मिक ऊर्जा, शांति और सकारात्मकता का अनुभव किया।

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