शिमला… प्रो. विवेकानंद तिवारी (अध्यक्ष आम्बेडकरपीठ एचपीयू)की 201 वीं पुस्तक *”गाँधी, लोहिया और स्वदेशी”* का लोकार्पण एचपीयू के समिति कक्ष में भव्यता के साथ संपन्न हुआ।
समारोह का शुभारंभ जगद्गुरु रमेश चंद्र महाराज के आचार्यत्व मे वैदिक एवं लौकिक मंगलाचरण से हुआ।
अतिथि परिचय विनीत कुमार तथा अतिथि सम्मान सुशील कुमार ने किया।
पुस्तक रिव्यू सिम्पल शर्मा और
विषय प्रवेश अभिजित शर्मा ने किया। भजन और राष्ट्रीय गीत डां रवि शर्मा ने गाया
धन्यवाद ज्ञापन कार्यक्रम संयोजक और अखिल भारतीय सारस्वत परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष गौरव शर्मा ने किया।
*मुख्य* *अतिथि हरीश जनार्था* ने कहा कि महात्मा गांधी ने विकास के नियमों के रूप में स्वदेशी को स्वीकार कर उन्होंने आधुनिक सभ्यता के आधारों को चुनौती दी उन्होंने बताया कि पश्चिम की औद्योगिक सभ्यता दुर्बल राष्ट्रों के शोषण पर आधारित है। उनका नारा “गांव की ओर लौटो’ का था वह महसूस करते थे कि ब्रिटिश पूंजीवाद ने भारत के देहाती अर्थशास्त्र के अस्तित्व के लिए खतरा उत्पन्न कर दिया है। वह खादी,स्वदेशी, मातृभाषा में शिक्षा, और विद्यालय श्रम शक्ति को स्वदेशी का कार्यक्रम बताते थे।
गांधी ने असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन एवं भारत छोड़ो आंदोलन में सत्य अहिंसा की तरह स्वदेशी, स्वालंबन आदि का प्रयोग किया।
लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता करते हुए *कुलपति आचार्य महाबीर सिंह* ने कहा स्वदेशी का अर्थ केवल देश में बनी वस्तुओं का उपयोग करना नहीं, बल्कि आंतरिक अनुशासन और आत्म-निर्भरता विकसित करना है, जो आध्यात्मिक विकास के लिए आवश्यक है।
भारत में स्वदेशी आन्दोलन ने भारतीयों को आत्मनिर्भरता का महत्व सिखाया और राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिशा दी.
यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ, जिसने भविष्य के आंदोलनों की नींव रखी।
इस अवसर पर सारस्वत अतिथि *ज्ञान सागर नेगी ने* कहा कि स्वदेशी एक जीवन शैली है। ‘स्वदेशी’ का अर्थ केवल विदेशी वस्तुओं का त्याग नहीं, बल्कि अपनी भूमि, भाषा, संस्कृति, रीति-रिवाजों और प्राचीन ज्ञान समझना, अपनाना और पोषित करना था, जो एक समृद्ध और विविध समाज का आधार था।
इस अवसर पर डां अशोक कुमार तिवारी, पीयूष शर्मा, , कार्य परिषद् सदस्य, सुरेश जी, मनमोहन, विकास कुमार ,विक्रम चौहान पुनीत शर्मा आदि उपस्थित थे

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