शिमला। हिमाचल प्रदेश के दो शिक्षकों का राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चयन हुआ है। शिक्षा मंत्रालय की ओर से जारी सूची के अनुसार राजकीय प्राथमिक पाठशाला अनोगा चंबा के प्रभारी जेबीटी शिक्षक युद्धवीर और राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक स्कूल धरोगड़ा शिमला में तैनात शिक्षक वीरेंद्र कुमार को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा।
राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला धरोगड़ा में टीजीटी के पद पर कार्यरत वीरेंद्र कुमार को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चुना गया है। वीरेंद्र कुमार पढ़ाने के साथ बच्चों की लिखावट को सुधारने का काम भी कर रहे हैं। छुट्टियों में वह शिमला के गेयटी थिएटर में बच्चों को लिखावट सुधारने के लिए कक्षाएं लगाते हैं। इसके अलावा ऑनलाइन भी वह लिखावट सुधारने का काम करते हैं। वर्ष 2018 में उन्होंने लिखावट में सुधारने का काम शुरू किया था। 4 सालों में वह 90 हजार बच्चों की लिखावट सुधार चुके हैं। इनमें ओमान, यूएई, यूएसए और यूके शामिल है। वीरेंद्र कुमार ने बताया कि दुबई से उन्हें फोन आया। महिला ने उन्हें कहा कि उनका बच्चा ईशान इब्राहिम को स्कूल ने निकाल दिया है। स्कूल से निकालने का तर्क दिया कि वह लिखने में कमजोर है और उसकी स्पीड नहीं है। 12 दिन विशेष कक्षाएं लगाकर उसकी लिखावट में सुधार किया। अब दोबारा वह बच्चा उसी स्कूल में पढ़ता है। वीरेंद्र कुमार ने बताया कि उनहोंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा राजकीय प्राथमिक पाठशाला संदोआ से प्राप्त की है। उनके पिता भी स्कूल में शिक्षक थे। उनकी शुरू से ही रूची थी कि वह स्कूल शिक्षक बनें। 17 सालों तक वह जेबीटी के शिक्षक के पद पर कार्य किया। 5 सालों से वह टीजीटी शिक्षक हैं।
अब मास्टर ट्रेनर किए तैयारवीरेंद्र कुमार ने बनाया कि वह पहले अपने स्तर पर ही बच्चों की लिखावट में सुधार करने का कार्य कर रहे थे। अब उन्होंने प्रदेशभर में 250 के करीब मास्टर ट्रेनर तैयार किए हैं। अब वह बच्चों की लिखावट में सुधार पर कार्य कर रहे हैं।
4 किताबें लिखी है
वीरेंद्र कुमार ने अध्यापन के साथ 4 किताबें भी लिखी है। वह पहले ऐसे प्राइमरी शिक्षक रहे हैं जिन्होंने शिक्षण शास्त्र पर किताब लिखी है। इसमें पढ़ाई को कैसे रोचक बनाया जा सकता है इसके बारे में बताया गया है। काफी समय तक वह डाइट जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान में भी कार्यरत रहे हैं। वीरेंद्र कुमार ने कहा कि उनके पिता शिक्षक थे। उन्होंने अपनी पढ़ाई गांव के स्कूल से की है। उस वक्त स्कूल में बैठने के लिए भी उचित व्यवस्था नहीं होती थी। आज काफी चीजें बदल गई है। धरोगड़ा के साथ लगते संदोआ गांव से संबंध रखते हैं वहां पर अब जाकर सड़क बनी है। अभी तक वहां के लिए कोई बस भी नहीं जाती।

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