September 5, 2026

विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता समाप्त करने के प्रस्ताव के विरोध में HPUTWA का धरना

शिमला,। हिमाचल प्रदेश के छह विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया में बदलाव कर नियुक्तियां लोक सेवा आयोग के माध्यम से किए जाने संबंधी प्रस्तावित विधेयक के विरोध में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिक्षक कल्याण संघ (HPUTWA) ने बुधवार को धरना-प्रदर्शन किया। प्रदर्शन में विश्वविद्यालय के अनेक वरिष्ठ प्रोफेसरों और शिक्षकों ने भाग लेकर प्रस्तावित विधेयक के खिलाफ अपनी चिंता और विरोध दर्ज कराया।
धरने को संबोधित करते हुए HPUTWA अध्यक्ष प्रो. नितिन व्यास ने प्रस्तावित विधेयक को विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, संस्थागत पहचान और अकादमिक स्वतंत्रता को कमजोर करने वाला कदम बताया। उन्होंने कहा कि शिक्षकों की भर्ती विश्वविद्यालय की स्वायत्तता का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे बाहरी नियंत्रण में देने से विश्वविद्यालयों के भविष्य को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा होती हैं।
प्रो. व्यास ने कहा कि यदि विश्वविद्यालयों को रणनीतिक ही नहीं, बल्कि दैनिक और नियमित प्रशासनिक एवं अकादमिक निर्णयों के लिए भी बाहरी स्वीकृतियों पर निर्भर रहना पड़ेगा, तो निर्णय लेने की प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब हो सकता है। इससे अकादमिक स्वतंत्रता और संस्थागत लचीलापन प्रभावित होने के साथ शिक्षकों की निर्णय-प्रक्रिया में भागीदारी भी कम हो सकती है। उन्होंने आशंका जताई कि इसका प्रतिकूल प्रभाव शिक्षण, शोध और नवाचार पर पड़ सकता है।
HPUTWA ने स्पष्ट किया कि स्वायत्तता और जवाबदेही एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। संघ के अनुसार, यदि किसी संस्था में अनियमितताओं के आरोप हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच, ऑडिट, साक्ष्य-आधारित मूल्यांकन और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से जवाबदेही तय की जानी चाहिए। कुछ संस्थानों में कथित अनियमितताओं के आधार पर सभी स्वायत्त विश्वविद्यालयों की शक्तियों को सीमित करना उचित नहीं है। संघ ने आशंका जताई कि इससे निर्णय पूर्वधारित धारणाओं पर आधारित होने का संदेश जा सकता है।
धरने के दौरान Career Advancement Scheme (CAS) का मुद्दा भी उठाया गया। संघ ने कहा कि CAS और विश्वविद्यालय की स्वायत्तता का प्रश्न केवल सेवा संबंधी मांगें नहीं हैं, बल्कि ये शिक्षकों की अकादमिक गरिमा, पेशेवर सम्मान, संस्थागत स्वतंत्रता और विश्वविद्यालयों के भविष्य से जुड़े व्यापक विषय हैं।
शिक्षकों ने यह सवाल भी उठाया कि यदि Ph.D., शोध प्रकाशन, शोध अनुभव, अकादमिक उपलब्धियों और वर्षों के शैक्षणिक योगदान को उचित महत्व नहीं दिया जाएगा, तो उच्च शैक्षणिक योग्यताओं की प्रासंगिकता क्या रह जाएगी। HPUTWA ने कहा कि उच्च शिक्षा का आधार ज्ञान, शोध, योग्यता, नवाचार और अकादमिक उत्कृष्टता है तथा नीतियां इन्हीं मूल्यों को मजबूत करने वाली होनी चाहिए।
HPUTWA सचिव डॉ. अंकुश भारद्वाज ने कहा कि प्रस्तावित विधेयक केवल किसी एक विश्वविद्यालय या संगठन से जुड़ा विषय नहीं है। विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और भर्ती अधिकार कमजोर होने की स्थिति में इसका प्रभाव पूरे उच्च शिक्षा तंत्र पर पड़ सकता है। उन्होंने शिक्षकों और कर्मचारियों से एकजुट होकर लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक तरीके से अपने अधिकारों की रक्षा करने का आह्वान किया।
धरना-प्रदर्शन के माध्यम से HPUTWA ने सरकार से प्रस्तावित विधेयक पर पुनर्विचार करने और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, अकादमिक स्वतंत्रता तथा भर्ती संबंधी अधिकारों को बनाए रखने की मांग उठाई।

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